क्योंकि इस ब्लॉग की रचनाएँ अधिकांशतः अन्य व्यक्तियों द्वारा रचित हैं, मैंने तो बस उनसे उधार लिया हैं !इसके लिए मैं सभी ज्ञात अज्ञात रचनाकारों को धन्यवाद देता हूँ..
Saturday, July 9, 2011
EXCITING NEW DISCOVERY IN PHYSICS.....THE HEAVIEST ELEMENT EVER KNOWN!!..........
Dear All,
You might very well recognise this path breaking discovery ... ...
A major research institution in India has recently announced the discovery
of the heaviest element yet known to science. The new element has been named
'Governmentium'.
Governmentium (Gv) has one neutron, 25 assistant neutrons, 88 deputy
neutrons, and 198 deputy assistant neutrons, giving it an atomic mass of
312. These 312 particles are held together by forces called morons, which
are surrounded by vast quantities of lepton-like particles called peons.
Since Governmentium has no electrons, it is inert. However, it can be
detected, because it impedes every reaction with which it comes into
contact. A minute amount of Governmentium causes one reaction to take over
four days to complete, when it would normally take less than a second.
Governmentium has a normal shelf-life of 5 years; it does not decay, but
instead undergoes a reorganization in which a portion of the assistant
neutrons and deputy neutrons change places! In fact, governmentium's mass
will actually increase over time, since each reorganization will cause more
morons to become neutrons, forming isodopes.
This characteristic of moron promotion leads some scientists to believe that
Governmentium is formed whenever morons reach a certain quantity in
concentration. This hypothetical quantity is referred to as Critical Morass.
When catalysed with money, Governmentium becomes Administratium - an element
which radiates just as much energy as Governmentium since it has half as
many peons but twice as many morons
--
Monday, June 20, 2011
Friday, April 29, 2011
गब्बर सिंह जी का चरित्र चित्रण
*गब्बर सिंह** **का चरित्र चित्रण*
1.* **सादा जीवन**, **उच्च विचार*: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और
मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी,महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश
जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो.जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित
कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में
उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की
क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.
२. *दयालु प्रवृत्ति**:* ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने
ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर
उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.
3.* **नृत्य**-**संगीत का शौकीन*: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार
ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह
जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद
उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था.उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को
एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त
करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.
*4. **अनुशासनप्रिय नायक**:* जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम
होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को
दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.
*5. **हास्य**-**रस का प्रेमी**:* उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और
उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो
हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक यु का 'लाफिंग बुद्धा' था.
*6. **नारी के प्रति सम्मान*: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद
उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.
*7. **भिक्षुक जीवन**:* उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए
भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा
-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी
या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.
*8. **सामाजिक कार्य**:* डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का
भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो
जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन
बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का
यह सच्चा प्रयास था.
*9. **महानायकों का निर्माता**:* अगर गब्बर नहीं होता तो जय और व??रू जैसे
लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के
व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.
Saturday, April 23, 2011
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा
सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही है
हड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही है
लेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैं
ईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैं
वोटर से वोट लेकर वे कर गए किनारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
जब अंतरात्मा का मिलता है हुक्म काका
तब राष्ट्रीय पूँजी पर वे डालते हैं डाका
इनकम बहुत ही कम है होता नहीं गुज़ारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
हिन्दी के भक्त हैं हम, जनता को यह जताते
लेकिन सुपुत्र अपना कांवेंट में पढ़ाते
बन जाएगा कलक्टर देगा हमें सहारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
फ़िल्मों पे फिदा लड़के, फैशन पे फिदा लड़की
मज़बूर मम्मी-पापा, पॉकिट में भारी कड़की
बॉबी को देखा जबसे बाबू हुए अवारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
जेवर उड़ा के बेटा, मुम्बई को भागता है
ज़ीरो है किंतु खुद को हीरो से नापता है
स्टूडियो में घुसने पर गोरखा ने मारा
सारे जहाँ से अच्छा .......
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जाँ से हम निकल जाएँ
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है
यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सजदे में रहती है
अमीरी रेशम-ओ-कमख़्वाब में नंगी नज़र आई
ग़रीबी शान से इक टाट के पर्दे में रहती है
मैं इन्साँ हूँ बहक जाना मेरी फ़ितरत में शामिल है
हवा भी उसको छू कर देर तक नश्शे में रहती है
मुहब्बत में परखने जाँचने से फ़ायदा क्या है
कमी थोड़ी-बहुत हर एक के शजरे में रहती है
ये अपने आप को तक़्सीम कर लेता है सूबों में
ख़राबी बस यही हर मुल्क के नक़्शे में रहती है.
गरीब हूँ मैं..
रोटी के लिए घूमता रहता हूँ ,
इधर उधर ,
पाँव छिल जाते है ,
रुकता नही हूँ मगर ,
दिल से देगा मुझे कोई उसे भगवान् उसे बहुत देगा
मेरी दुआ है सभी के लिए ,
चाहे कोई बड़ा हो या छोटा ,
मिटटी के खिलौनों से खेलते है बच्चे मेरे ,
गर्मी सर्दी बारिश को हंस कर झेलते है
सर पर छत भी न दे सका अपने बच्चो को
बाप में अजीब हूँ
गरीब हूँ में मजबूर हूँ मैं ,
पूरी नही कर पाता बच्चो की इच्छाओ को ,
बहुत ही बदनसीब हूँ मैं ,
गरीब हूँ मैं गरीब हूँ मैं......
Subscribe to:
Posts (Atom)

